Report by - Sandeep kumar Sharma
हापुड। दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई के रूप में अभिशाप बनकर पूर्ण रूप से समाज में पैर पसार चुकी है जिसका निस्तारण संभव ही नहीं असंभव सा लगता है लेकिन आज के दौर में भी ऐसे मानस मिलेंगे जो समाज की इस बुराई पर करारा तमाचा दिखाने के लिए तैयार हैं जो उदाहरण पेश कर रहे हैं इस बढ़ती कुरीति के खिलाफ, जिनमे समाजसेवी डॉ. आदित्य कुमार त्यागी का ताज़ा उदाहरण सभी के लिये प्रेरणादायक और मिसाल दोनों हैं दहेज की बात करें हम और अपना इतिहास उठाकर भी देखें तो ऋग वैदिक काल में इसका कोई नामोनिशान तक नहीं था लेकिन उत्तर वैदिक काल में इसके बीज पड़ने शुरू हो गये और वर्तमान तक आते आते हैं तो यह घृणित रूप में हमारे सामने विराजमान हो ही गया समाज में | वर्तमान समय में दहेज व्यवस्था एक ऐसी प्रथा का रूप ले चुकी है जिसके अंतर्गत युवती के माता पिता द्वारा दिये गये दहेज से ही युवक के परिवार वालों का सम्मान दहेज में दिए गए धन दौलत पर निर्भर करता है और दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए अब तक जितने नियम और 0 कानून बनाए गए हैं वह भी कोई कारगर सिद्ध नहीं हो पाए हैं।इतना ही नहीं शादी में दिए गए दहेज को उपहार बना कर लोग लेने भी लगे और देने भी लगे,देना मजबूरी बन गई और लेना उनकी सामाजिक हैसियत बन गया | सबसे बड़ा करारा आघात तो समाज में उनके लिये है जो लोग संपन्न परिवार से हैं लेकिन विवाह} में उपहारस्वरूप दहेज लेना उनकी हैसियत में शामिल हो गया है और समाज के लिए सबसे बड़ी शर्म की बात तो तब आती है कि ज़ब स्वयं नवयुवक इसी शिक्षित समाज में स्वयं को शिक्षित मानते हुए विवाह में दहेज ले रहे होते है और उस बात को सही मानते हुए भी उसका विरोध करने के लिए तैयार नहीं है कहीं ना कहीं उनके मस्तिष्क में भी यह हैसियत के रूप में शामिल हो गया है कि वह इतना काबिल है तो क्यों नहीं दहेज मिले उसे,जबकि इसी दहेज का विकराल रूप हमारे सामने न जाने कितनी विवाहिताओं की हत्या के रूप में,जला देने के रूप में विकराल स्थितियों के रूप में सामने आया है और लोग तमाशबीन बनकर उसे देख रहे है और उसे बढ़ावा भी दे रहे हैं |मजाक की बात तो तब आती है जब दहेज को हमारी रीतियों में शामिल कर दिया और हमें पता भी नहीं चला| हम उसे रीतियों की और परंपराओं की दुहाई बताने लगे | जहां हम एक ओर बेहतर भविष्य की बात करते हैं युवा पीढ़ी के बेहतर सोच की बात करते हैं,आधुनिकता की बात करते हैं लेकिन हमें सोचना भी चाहिए और विचारना भी चाहिए कि हम किस बात में आधुनिक हैं हमारा मस्तिष्क तो ऐसी सोच में जकड़ा हुआ है जो आधुनिकता से कोसों दूर है और स्वयं को आधुनिकता मानते हैं उनके लिये इस मानसिकता से बाहर निकलना हमारे लिए असंभव सा प्रतीत होता है और हम आधुनिकता की बात करते हैं | इसी नकारात्मक परिवर्तन के दौर में भी कुछ मानस है जो समाज के लिए मिसाल हैं और उनसे हमें शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए,उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।अभी ताजा उदाहरण हमारे सामने डॉ आदित्य कुमार त्यागी (चेयरमैन दयावती कॉलेज ऑफ लॉ बनखण्डा हापुड़ ) का हमारे सामने हैं जिन्होंने इस प्रथा का विरोध करते हुए अपने विवाह जैसे पवित्र बंधन में बनने के लिए कुछ नही लेने का वादा करके ही अपने रिश्ते को आगे बढ़ाया और एक पौधे का आदान प्रदान करके शुभ विवाह के पवित्र बंधन में बँधे| यह हमारे समाज के लिए ऐसे शुभ संकेत हैं जो समाज के लिए मिसाल पेश करते हैं जो समाज के लिए नजीर हैं कि प्रत्येक स्त्री को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले और वह कदम से कदम बढ़ा कर हमारे साथ चलें ताकि हमारा भविष्य एक बेहतर उदाहरण के रूप में आने वाली पीढ़ी के लिए हमारी सुदृढ मानसिकता को उच्च दर्जे का साबित करे | (डॉ. गरिमा त्यागी) ने बताया कि ऐसे बहुत कम व्यक्ति समाज में ऐसे होते हैं जो ऐसा साहसिक क़दम उठाते हैं और ऐसी कुरीतियों का विरोध करने का साहस दिखाते हैं मुझे गर्व है कि मुझे जीवनसाथी के रूप में ऐसे व्यक्ति मिले जिनमे ऐसी कुप्रथाओं के खिलाफ में क़दम बढ़ाने की हिम्मत है |



